Tuesday, October 8, 2019

रात भर सर्द हवा चलती रही

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी|
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के दाल दिया जलाते अलावों मसं उसे
रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |

Sunday, September 22, 2019

"तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं।"

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बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं।

मेरी नजरें भी ऐसे काफ़िरों की जान ओ ईमाँ हैं
निगाहे मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं।

जिसे कहती दुनिया कामयाबी वाय नादानी
उसे किन क़ीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं।

निगाहे-बादागूँ, यूँ तो तेरी बातों का क्या कहना
तेरी हर बात लेकिन एहतियातन छान लेते हैं।

तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों के चादर तान लेते हैं

खुद अपना फ़ैसला भी इश्क में काफ़ी नहीं होता
उसे भी कैसे कर गुजरें जो दिल में ठान लेते हैं

हयाते-इश्क़ का इक-इक नफ़स जामे-शहादत है
वो जाने-नाज़बरदाराँ, कोई आसान लेते हैं।

हमआहंगी में भी इक चासनी है इख़्तलाफ़ों की
मेरी बातें ब‍उनवाने-दिगर वो मान लेते हैं।

तेरी मक़बूलियत की बज्‍हे-वाहिद तेरी रम्ज़ीयत
कि उसको मानते ही कब हैं जिसको जान लेते हैं।

अब इसको कुफ़्र माने या बलन्दी-ए-नज़र जानें
ख़ुदा-ए-दोजहाँ को देके हम इन्सान लेते हैं।

जिसे सूरत बताते हैं, पता देती है सीरत का
इबारत देख कर जिस तरह मानी जान लेते हैं

तुझे घाटा ना होने देंगे कारोबार-ए-उल्फ़त में
हम अपने सर तेरा ऎ दोस्त हर नुक़सान लेते हैं

हमारी हर नजर तुझसे नयी सौगन्ध खाती है
तो तेरी हर नजर से हम नया पैगाम लेते हैं

रफ़ीक़-ए-ज़िन्दगी थी अब अनीस-ए-वक़्त-ए-आखिर है
तेरा ऎ मौत! हम ये दूसरा एअहसान लेते हैं

ज़माना वारदात-ए-क़्ल्ब सुनने को तरसता है
इसी से तो सर आँखों पर मेरा दीवान लेते हैं

‘फ़िराक’ अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं
-फ़िराक़ गोरखपुरी

Thursday, September 19, 2019

" किताबें झाँकती हैं "

                                                         Art By ~ Gaurav Kumar
किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़
जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते
जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे!!
~ गुलज़ार

"Wo Kitab ! "

Art By ~ Vikash
mirī zindagī likhī huī
mire tāq-e-dil pe sajī huī
vo kitāb ab bhī hai muntazir
jise maiñ kabhī nahīñ paḌh sakī
vo tamām baab sabhī varaq
haiñ abhī talak bhī juḌe hue
mirā ahd-e-dīd bhī aaj tak
unheñ vo judā.ī na de sakā
jo har ik kitāb ruuh hai
mujhe ḳhauf hai ki kitāb meñ
mire roz-o-shab aziyyateñ
vo nadāmateñ vo malāmateñ
kisī hāshiye pe raqam na hoñ
maiñ fareb-ḳhurda-e-bartarī
maiñ asīr-e-halqa-e-buz-dilī
vo kitāb kaise paḌhūñgī maiñ?

~ Zehra Nigah

"वो क्या मौसम का झोखा था जो दीवार पर लटकती हुई तस्वीर तिरछी कर गया है "

Art by ~ Gaurav Kumar
वो क्या मौसम का झोंका था
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किसी मौसम का झोंका था
जो इस दीवार पर लटकी हुई तसबीर तिरछी कर गया है
गये सावन मे ये दीवारे युँ सीली नही थी
न जाने इस द्फा क्युँ इनमे सीलन आ गयी है दरारे पड गयी हैं ...

और
सीलन इस तरह बहती है जैसे
खुस्क रुखशारो पर नीले आंसू चलते हैं.....

ये बारिश गुंगुनाती थी
इसी छ्त की मुडेरो पर ....
ये बारिश गुंगुनाती थी...

ये घर की खिड्कियो के कांच पर
उंगली से लिख जाती थी सन्देशे....

बिलखती रहती है बैठी हुई अब
बन्द रोशनदानो के पीछे

दुपहरे ऐसी लगती हैं
बिना मोहरो के खाली खाने रखे हैं

न कोई खेलने वाला है बाजी
और न कोई चाल चलता है

न दिन होता है अब न रात होती है
सभी कुछ रुक गया है

वो क्या मौसम का झोंका था
जो इस दीवार पर लटकी हुई
तसबीर तिरछी कर गया है.....

             ~गुलज़ार