Thursday, September 19, 2019

"वो क्या मौसम का झोखा था जो दीवार पर लटकती हुई तस्वीर तिरछी कर गया है "

Art by ~ Gaurav Kumar
वो क्या मौसम का झोंका था
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किसी मौसम का झोंका था
जो इस दीवार पर लटकी हुई तसबीर तिरछी कर गया है
गये सावन मे ये दीवारे युँ सीली नही थी
न जाने इस द्फा क्युँ इनमे सीलन आ गयी है दरारे पड गयी हैं ...

और
सीलन इस तरह बहती है जैसे
खुस्क रुखशारो पर नीले आंसू चलते हैं.....

ये बारिश गुंगुनाती थी
इसी छ्त की मुडेरो पर ....
ये बारिश गुंगुनाती थी...

ये घर की खिड्कियो के कांच पर
उंगली से लिख जाती थी सन्देशे....

बिलखती रहती है बैठी हुई अब
बन्द रोशनदानो के पीछे

दुपहरे ऐसी लगती हैं
बिना मोहरो के खाली खाने रखे हैं

न कोई खेलने वाला है बाजी
और न कोई चाल चलता है

न दिन होता है अब न रात होती है
सभी कुछ रुक गया है

वो क्या मौसम का झोंका था
जो इस दीवार पर लटकी हुई
तसबीर तिरछी कर गया है.....

             ~गुलज़ार

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